बच्चों के प्यारे थे चाचा नेहरू

                                       ''बाल-दिवस'' (14 नवम्बर) पर विशेष



आज से 130 वष पूर्व आज ही के दिन (14 नवंबर) को इलाहाबाद में प्रख्यात बैरिटर पं. मोतीलाल नेहरू के यहां जन्म लेने वाला व्यक्तित्व अपने आप में कितना अनूठा था इसे सभी पं. जवाहर लाल नेहरू के नाम से जानते हैं। पं. जवाहर लाल नेहरू की प्रारंभिक शिक्षा उनके घर पर ही निजी शिक्षक के सान्निध्य में हुई तथा मात्र 15 वर्ष की आयु में वे उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड चले गये। वहां हैरो में दो वर्ष पढने के बाद कैम्ब्रिज विश्व विद्यालय में प्रवेश लिया जहां से उन्होंने प्राकृतिक विज्ञान (नेचुरल साइंस) में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। वहां से वापिस आने पर वे 1912 में भारतीय स्वाधीनता हेतु राजनीति से जुड़ गये। 1916 में वे महात्मा गांधी से पहली बार मिले और परस्पर दोनों ही प्रभावित हुए। यहीं से उनकी धारा पूर्ण रूप से स्वराज के प्रति अग्रसर हो उठी। पंडित नेहरू 1923 में प्रथम बार अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव बने। फिर तो देश और विदेश में जगह-जगह घूम कर आजादी के लक्ष्य को मजबूत करते रहे। 1938 में वे स्पेन भी गये वहां उन दिनों गृहयुद्ध अपने चरम पर था। द्वितीय विश्व युद्ध में भारत के सैनिक भाग लें-इसका उन्होंने पुरजोर विरोध किया और व्यक्तिगत सत्याग्रह भी किया जिसके कारण अक्टूबर 1940 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। दिसम्बर 1941 में जेल से रिहा होने के बाद 1942 को मुम्बई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में ऐतिहासिक संकल्प 'भारत छोड़ो' को कार्य रूप देना शुरू कर दिया। महात्मा गांधी के संरक्षण में वे भारतीय स्वतंत्रता की स्थापना 1947 से लेकर 1964 (मृत्युपर्यन्त) तक भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पद का शालीनतापूर्वक निर्वहन किया। पंडित नेहरू को एक सम्प्रभु समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और एक वृहद लोकतांत्रिक गणतंत्र का वास्तुकार माना जाता है। अपने राजनीतिक, राष्ट्रसेवा एवं प्रशासनिक व्यस्त कार्यकलापों से वे बच्चों को विशेष रूप से समय देते थे। वे बच्चों को बहुत प्यार करते थे इसीलिए बच्चे भी उन्हें 'चाचा नेहरू' के नाम से संबोधित करते थे। बच्चों के साथ खेलने में वे अपने महत्वपूर्ण स्थान को भी भुला देते थे। एक बार इलाहाबाद के एक विद्यालय में वे बच्चों के साथ घुल-मिल गये और उनसे उनकी कठिनाईयां जाननी चाही। लगभग सभी ने कहा कि विद्यालय आने में बारिश में भीग लाते हैं किताबें खराब हो जाती हैं। पंडित नेहरू दिल्ली लौट आये। सभी ने सोचा कि इतने बड़े राष्ट्र का संचालन करने वाले प्रधानमंत्री हमारी बात क्यों याद रखने लगे हैं। परंतु जौलाई के प्रथम सप्ताह में ही उस विद्यालय के प्रधानाध्यापक के नाम एक पार्सल आया जिसमें लगभग विद्यालय के बच्चों के लिए रेनकोट थे। बच्चे खुशी से उछल पड़े, अपने उपहार देखकर और चाचा नेहरू जिन्दाबाद.... के नारे लगाने लगे।
पंडित नेहरू एक आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी होने के साथ-साथ विशाल हृदय भी थे। उनसे पूर्व बच्चों में इतने लोकप्रिय कोई नेता नहीं थे। पंडित नेहरू का मानना था कि बच्चों को प्यार और तवज्जों देना चाहिए क्योंकि वे कल के राष्ट्र निर्माता हैं, और बचे ही देश की असली ताकत हैं। बच्चों के दिल और दिमाग शुद्ध और निर्दोष होते हैं। इसीलिए भारतवर्ष में 14 नवंबर को पंडित नेहरू ने अपना जन्म दिवस बच्चों के लिए समर्पित ''बाल-दिवस'' के रूप में मनाने का निश्चय किया। इस दिन विशेष रूप से बालकों के उत्थान के लिए उन्नति के लिए विभिन्न कार्यक्रम किये जा रहे हैं। इसे विद्यालयों तथा सामाजिक संगठनों द्वारा धूमधाम से मनाया जाता है।